मेरी नज़्म पे जो मचल रहा वो हाशिया कोई और है
जो वक़्त की करवट बदल रहा वो वाक़िया कोई और है
मेरी ज़ुबां से निकल पड़ी ये बात तेरे दिल की है
जो ग़ज़ल के भीतर सँभल रहा वो क़ाफ़िया कोई और है
- रचना २८ अक्टूबर २०१३
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Wednesday, October 30, 2013
मेरी नज़्म पे जो मचल रहा
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