Saturday, May 29, 2010

मिट्टी के बरतन

आफ़ताब बरसा है तेरे नाम पर सावन की तरह,
जिस्म सुलगा है तेऱी याद में ईंधन की तरह,
इस बुलन्दी से तुमने मुझे नवाज़ा क्यों था,
गिर के टुट गये 'तन्हा' मिट्टी के बरतन की तरह

- आशिक़ा 'तन्हा'

निमत

मेरी ख़्वाहिश और मेरी ज़रूरत -
दिन और रात की निमत,
जुडे तो हैं, पर, मिले नहीं

मुश्ताक़

दरार

बहक जाता है दीमाग़, तडप जाता है ज़हन,
नाच उठती हैं नज़रें,
तुम्हारी ख़ामोशी की ज़िद्दी दीवार में एक
दरार दिखने के साथ

- मुश्ताक़

Thursday, May 27, 2010

फ़नाह

लफ़ज़ों में फ़साने ढूँढते हैं, लम्हों में ज़माने ढूँढते हैं,
आप ज़हर भी दो मगर प्यार से,
हमतो आप पर फ़नाह होने के बहाने ढूँढते हैं

मुशाहिद

तरन्नुम

ज़िन्दगी हो या पकवान, तपिश-ए-हालात की रंग लगती है,
वरना आरामतलबी के ज़ख़्म तरन्नुम नहीं बना करते

मुश्ताक़

यादों की हिरासत

एक उम्र हुई आपकी यादों की हिरासत में,
शायद पहला क़ैदी हूँ जिसे अज़ादी नागवर रही

- मुश्ताक़

नाम ए ख़ुदा

नाम-ए-रक़ीब न हुआ, नाम-ए-ख़ुदा हुआ,
हमारा दुश्मन, तुम्हारा ख़ुदा हुआ

- मुश्ताक़