कभी तो सोच के वह शख़्स किस कदर था बुलन्द
जो झुक गया तेरे कदमों में आसमाँ की तरह|
कभी तो खुल के बरस अब्र ए महरबाँ की तरह
मेरा वजूद है जलते हुए मकान की तरह||
अनजान
Wednesday, February 9, 2011
सभी नग़मे साज़ में गाये नहीं जाते
सभी नग़मे साज़ में गाये नहीं जाते,
सभी लोग महफ़िल में बुलाये नहीं जाते,
कुछ पास रहकर भी याद नहीं आते
कुछ दूर रहकर भी भुलाए नहीं जाते|
- शहनाज़ बाबी
सभी लोग महफ़िल में बुलाये नहीं जाते,
कुछ पास रहकर भी याद नहीं आते
कुछ दूर रहकर भी भुलाए नहीं जाते|
- शहनाज़ बाबी
एक ही नज़र से
एक ही नज़र से वह कर गए क़त्ल-ए-आम,
भरे के भरे से रह गए सारे जाम,
चुलबुलाकर चहचहाकर हुए वह ग़ायब
हस्ब-ए-मामूल शराब हुई बदनाम
- मुश्ताक़
भरे के भरे से रह गए सारे जाम,
चुलबुलाकर चहचहाकर हुए वह ग़ायब
हस्ब-ए-मामूल शराब हुई बदनाम
- मुश्ताक़
न हो दीवानगी तो
न हो दीवानगी तो चाहत क्या है,
न हो आवारगी तो जन्नत क्या है |
दिल निचोड़ना पड़ता है मुहब्बत में,
न हो बन्दगी तो खिदमत क्या है ||
- मुश्ताक़
न हो आवारगी तो जन्नत क्या है |
दिल निचोड़ना पड़ता है मुहब्बत में,
न हो बन्दगी तो खिदमत क्या है ||
- मुश्ताक़
Tuesday, February 8, 2011
दो बूँद नूरे ख़ुदाई जो पाया था
दो बूँद नूरे ख़ुदाई जो पाया था, खो दिया रोज़ाना झमेलों में,
लाएँ अब जॊशो जलाल कहाँ से हमारे थके हारे लब्ज़ों में?
- मुश्ताक़
लाएँ अब जॊशो जलाल कहाँ से हमारे थके हारे लब्ज़ों में?
- मुश्ताक़
कल रात न जाने
कल रात न जाने बादलों में क्या क्या सज़िश हुई,
मेरा घर ही मिट्टी का था, और उसी पे बारिश हुई|
- अनजान
मेरा घर ही मिट्टी का था, और उसी पे बारिश हुई|
- अनजान
मौत की आमद से
मौत की आमद से पहले मर जाना,
ख़ौफ़ की आहट से पूरे डर जाना,
फ़नकार तो मिट कर भी यही चाहेगा,
लौट के शौक़त से कुछ कर जाना!
- मुश्ताक़
ख़ौफ़ की आहट से पूरे डर जाना,
फ़नकार तो मिट कर भी यही चाहेगा,
लौट के शौक़त से कुछ कर जाना!
- मुश्ताक़
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